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संस्था की विकास यात्रा

2005
ध्यान में जन्मा विचार
स्थापना संकल्प

गुरुदेव श्री मुक्तिनाथ जी महाराज ने वेद शिक्षा के पुनर्जीवन का संकल्प लिया। पंचकूला की पुण्यभूमि को इस मिशन के लिए चुना गया।

2005
ध्यान में जन्मा विचार
स्थापना संकल्प

गुरुदेव श्री मुक्तिनाथ जी महाराज ने वेद शिक्षा के पुनर्जीवन का संकल्प लिया। पंचकूला की पुण्यभूमि को इस मिशन के लिए चुना गया।

2007
गुरुकुल की नींव
श्री मुक्तिनाथ वेद विद्या आश्रम की स्थापना

आश्रम की विधिवत स्थापना यज्ञोपवित संस्कार एवं वेदपाठ के साथ की गई। कुछ ही छात्रों से शिक्षण प्रारंभ हुआ।

2010
विद्या की पहली उपलब्धि
प्रथम दीक्षा समारोह

पहले दीक्षित शिष्यों का उत्सवपूर्ण समापन, जिनमें से कई आज स्वयं शिक्षण कार्य में संलग्न हैं।

2013
संरचना का विस्तार
गुरुकुल भवन निर्माण पूर्ण

आवासीय भवन, यज्ञशाला, भोजनालय एवं कक्षाओं का निर्माण पूरा हुआ। गुरुकुल पूर्णतः आवासीय बना।

2016
ज्ञान का आदान-प्रदान
शास्त्र सम्मेलन एवं विद्वत गोष्ठी

देशभर के आचार्यों, वेदज्ञों और संस्कृत प्रेमियों का समागम — वैदिक ज्ञान और संस्कृति पर संवाद।

2019
हर योग्य छात्र के लिए द्वार खुले
निःशुल्क प्रवेश योजना प्रारंभ

आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन मेधावी छात्रों के लिए संपूर्ण निःशुल्क शिक्षा एवं आवास की व्यवस्था।

2022
परंपरा और तकनीक का समागम
डिजिटल संस्कृत शिक्षण की शुरुआत

ऑनलाइन वेद व संस्कृत कक्षाओं का प्रारंभ, जिससे देश-विदेश के विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं।

2025
दो दशक की तपस्या
20 वर्ष पूर्ण

संस्था की 20वीं वर्षगाँठ समारोह — नए भवनों का शिलान्यास, पुस्तक विमोचन और अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन का आयोजन।

संस्थापक संदेश

गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति बालक के अज्ञान, प्रमाद एवं दुराग्रह को दूर कर उसकी सुप्त प्रतिभाओं का जागरण करते हुए उसके लिए ज्ञान-विज्ञान के द्वार खोलती है। गुरुकुलीय शिक्षा बालक में विनम्रता, सच्चरित्रता, साहस, स्वाभिमान, लक्ष्य के प्रति दृढ़‌ता, राष्ट्र के प्रति गौरव, कर्त्तव्य के प्रति सजगता, सहिष्णुता, करुणा, दया, प्रेम, सेवा व सद्भाव आदि मौलिक गुणों का विकास करती है।

संस्कृत हमारी सनातन संस्कृति की आत्मा है, और वेद इसका शाश्वत प्राण। आज जब भौतिकता की चकाचौंध में मूल्य एवं मर्यादाएँ धुंधली पड़ रही हैं, तब आवश्यक है कि हम अपने प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश में जीवन को फिर से अर्थवान बनाएं।

श्रीमुक्तिनाथ वेदविद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) का उद्देश्य केवल ग्रंथों का पठन-पाठन नहीं, अपितु ‘सा विद्या या विमुक्तये’ — उस ज्ञान का अभ्यास है जो आत्मा को बन्धनों से मुक्त कर सके, समाज में चेतना भर सके, और राष्ट्र को सांस्कृतिक बल दे सके।

श्री मुक्तिनाथ वेद विद्या आश्रम, पंचकूला (हरियाणा) में स्थित एक परंपरागत संस्कृत गुरुकुल है, जो भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा को जीवंत रखने हेतु समर्पित है। यहाँ विद्यार्थियों को वेद, शास्त्र, संस्कृत साहित्य, ज्योतिष और दर्शन की गहन शिक्षा निःशुल्क प्रदान की जाती है। आश्रम का उद्देश्य केवल विद्या देना नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार और सेवा भाव से परिपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण करना है। ध्यान, यज्ञ, योग और सत्संग की दैनिक साधना के साथ यह आश्रम विद्यार्थियों को जीवन की उच्चतम मूल्यों की ओर प्रेरित करता है, जिससे वे समाज और राष्ट्र के लिए एक सशक्त स्तंभ बन सकें।

सादर,

मुकुल बंसल
अध्यक्ष
श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) श्री माता मनसा देवी परिसर, पंचकूला, हरियाणा

विद्या ददाति विनय, विनयाद् प पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मं ततः सुखम्।।" (हितोपदेश)

मानव जीवन की सच्ची सम्पदा विद्या है और जब यह विद्या संस्कारों से युक्त हो तो वह आत्मोन्नति तथा लोकमंगल का माध्यम बन जाती है। भारतवर्ष की आत्मा उसकी सनातन ज्ञान परम्परा में समाहित है - वेद, उपनिषद्, दर्शन, साहित्य, योग, आयुर्वेद एवं शास्त्र-विचार की इस परम्परा ने न केवल भारतीय सभ्यता को पोषित किया, अपितु सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित किया। श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) पंचकूला, हरियाणा इसी दिव्य ज्ञान परम्परा के पुनरुद्धार का एक पावन प्रयास है। एक गुरुकुल के रूप में यहाँ शिक्षा का मूल आधार केवल पाठ्यपुस्तक या परीक्षाफल नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली है जिसमें अध्ययन, अनुशासन, आत्मानुशासन, सेवा, साधना, तथा संस्कृति के साथ छात्र का सर्वांगीण विकास होता है। हमारा गुरुकुल शुद्ध वेदाध्ययन के साथ-साथ संस्कृत-साहित्य, व्याकरण, आयुर्वेद, योग, न्याय-मीमांसा, एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के अन्य महत्वपूर्ण विषयों का प्रशिक्षण प्रदान करता है। यह संस्थान आचार्य-शिष्य परम्परा के सिद्धान्तों को आधार बनाकर विद्यार्थियों के मन, बुद्धि और आत्मा को संस्कारित करता है, जिससे वे केवल विद्वान् ही नहीं, अपितु चरित्रवान्, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बन सकें। एक प्रधान के रूप में मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यदि बाल्यकाल से ही छात्रों को भारतीय जीवनमूल्य, शास्त्रज्ञान एवम् आध्यात्मिक चेतना का उचित मार्गदर्शन मिले, तो वे न केवल अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं, अपितु समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रकाशस्तम्भ बन सकते हैं। हमारा यह प्रयास " श्रीमुक्तिनाथ वेदविद्याश्रम" केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि एक संकल्प है - भारत की उस दिव्य परम्परा को पुनः जनमानस में प्रतिष्ठित करने का, जो युगों-युगों तक ज्ञान और सदाचार की वाहक रही है। मैं समस्त अभिभावकों, विद्यार्थियों, सेवाव्रतीजनों एवं विद्वज्जनों से आग्रह करता हूँ कि वे इस ज्ञानयज्ञ में सहभागी बनें, और इस पुनीत कार्य को निरन्तर गति प्रदान करें। गुरुकुल का द्वार सभी जिज्ञासुजनों के लिए सदा उन्मुक्त भाव से खुला है। "न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । " — भगवद्गीता


सादर,
दिनेश सिंगला
संरक्षक
श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल)
श्री माता मनसादेवी परिसर, पंचकूला, हरियाणा

भारत की प्राचीन संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन में संलग्न श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर गतिमान है । प्राचीन मनीषियों ने मानवता के कल्याणार्थ जिन वेदों, उपनिषदों, दर्शनशास्त्रों, तथा विविध शास्त्रों का सृजन एवं संरक्षण किया है वे न केवल आध्यात्मिक चेतना के स्रोत हैं, अपितु मानव जीवन की सर्वांगीण उन्नति के अमूल्य आधार भी हैं, इसी उदात्त परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल), पंचकूला, हरियाणा की स्थापना की गई है । यह गुरुकुल आधुनिक सन्दर्भ के साथ ही परम्परागत शिक्षा प्रणाली को पुनः स्थापित करने का प्रयास है, जहाँ परम्परया वेदाध्ययन, संस्कृत-साहित्य, दर्शन योग, तथा भारतीय ज्ञान परम्परा का अध्ययन किया जाता है । यहां पर पठन-पाठन के साथ ही जीवनमूल्यों का संस्कार भी दिया जाता है, यहाँ विद्यार्थियों को गुरुकुल पद्धति के अन्तर्गत अनुशासन, ब्रह्मचर्य, साधना, सेवा की भी शिक्षा दी जाती है। यह गुरुकुल न केवल शास्त्रविद्या का केन्द्र है, बल्कि एक सांस्कृतिक अभियान भी है जो भारतीय जीवनदृष्टि को आत्मसात् करते हुए भावी पीढ़ी को उन्नत, सन्तुलित और चरित्रवान बनाने हेतु संकल्पित है। मैं इस पुनीत कार्य में सभी संस्कृत प्रेमियों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस ज्ञानयज्ञ में सहभागी बनें, तथा भारत की इस महान परम्परा को पुनः विश्वगुरु पद की ओर अग्रसर करें ।श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) पंचकूला, हरियाणा इसी दिव्य ज्ञान परम्परा के पुनरुद्धार का एक पावन प्रयास है। एक गुरुकुल के रूप में यहाँ शिक्षा का मूल आधार केवल पाठ्यपुस्तक या परीक्षाफल नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली है जिसमें अध्ययन, अनुशासन, आत्मानुशासन, सेवा, साधना, तथा संस्कृति के साथ छात्र का सर्वांगीण विकास होता है। हमारा गुरुकुल शुद्ध वेदाध्ययन के साथ-साथ संस्कृत-साहित्य, व्याकरण, आयुर्वेद, योग, न्याय-मीमांसा, एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के अन्य महत्वपूर्ण विषयों का प्रशिक्षण प्रदान करता है। यह संस्थान आचार्य-शिष्य परम्परा के सिद्धान्तों को आधार बनाकर विद्यार्थियों के मन, बुद्धि और आत्मा को संस्कारित करता है, जिससे वे केवल विद्वान् ही नहीं, अपितु चरित्रवान्, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बन सकें। एक प्रधान के रूप में मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यदि बाल्यकाल से ही छात्रों को भारतीय जीवनमूल्य, शास्त्रज्ञान एवम् आध्यात्मिक चेतना का उचित मार्गदर्शन मिले, तो वे न केवल अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं, अपितु समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रकाशस्तम्भ बन सकते हैं। हमारा यह प्रयास " श्रीमुक्तिनाथ वेदविद्याश्रम" केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि एक संकल्प है - भारत की उस दिव्य परम्परा को पुनः जनमानस में प्रतिष्ठित करने का, जो युगों-युगों तक ज्ञान और सदाचार की वाहक रही है। मैं समस्त अभिभावकों, विद्यार्थियों, सेवाव्रतीजनों एवं विद्वज्जनों से आग्रह करता हूँ कि वे इस ज्ञानयज्ञ में सहभागी बनें, और इस पुनीत कार्य को निरन्तर गति प्रदान करें। गुरुकुल का द्वार सभी जिज्ञासुजनों के लिए सदा उन्मुक्त भाव से खुला है। "न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । " — भगवद्गीता

सप्रेम
जय किशन सिंगल
सचिव श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल)
श्री माता मनसादेवी परिसर, पंचकूला, हरियाणा

"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥" ( भगवद्गीता 6.19 )

भारतवर्ष की आत्मा, उसकी संस्कृति एवं संस्कृत ज्ञानधारा भारतीय ज्ञानपरम्परा में समाहित है । यह परम्परा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक ही सीमित नहीं है अपितु समस्त मानव जीवन जीने का मूल आधार है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, रामायण से लेकर महाभारत तक हमारी परम्परा ने न केवल मानवता को दिशा दी है, बल्कि विश्वकल्याण का मार्ग भी प्रशस्त किया है। इन्हीं उदात्त परम्पराओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लक्ष्य को लेकर श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) पंचकूला, हरियाणा की स्थापना की गई। यह केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, अपितु एक सांस्कृतिक तीर्थ है, जहाँ विद्या के साथ संस्कार, शास्त्रों के साथ चरित्र, और साधना के साथ सेवा का समन्वय किया जाता है। यहां आधुनिक समय में भी संस्कृत शिक्षा के साथ साथ संस्कार, संस्कृति, सभ्यता एवं वेद पुराण गीता आदि का अध्ययन विना किसी भेद भाव के दो दशकों से कराया जाता है, यहां कि परम्परा पुरातन संस्कृत गुरुकुल परम्परा को पुनः स्थापित करने के लिए कटिबद्ध है, मैं इस परम्परा को अक्षुण्ण रखने के प्रयास हेतु गुरुकुल परिवार को बधाई देता हूं।

गुरुकुल - एक यात्रा

भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत भाषा को समर्पित संस्कृत संवर्द्धन में कटिबद्ध भारत को पुनः विश्वगुरु के स्थान पर सुशोभित करने के उद्देश्य से गुरुकुल के संस्थापक आचार्य स्वामी प्रसाद मिश्र (स्वामी श्रीनिवासाचार्य) ने अपने परमाराध्य वैकुण्ठवासी गुरुदेव अनन्त श्रीविभूषित श्री श्री 1008 स्वामी श्रीगोविन्दाचार्य जी के मार्गदर्शन में अपने जीवन को भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत के संरक्षण हेतु अर्पण करते हुए पूज्य गुरुदेव जी के आदेशानुसार 2001 में औद्योगिक क्षेत्र 67 (गीता प्रेस मन्दिर) फेस 1, चण्डीगढ़ में प्रथम गुरुकुल की स्थापना 07 विद्यार्थियों के साथ की। लगभग 2 वर्ष पश्चात् विद्यार्थियों की संख्या अधिक होते देख नए परिसर का अन्वेषण करते हुए मोरिंडा में 2004 में गुरुकुल की प्रथम शाखा का प्रारम्भ किया। इसके बाद महादेव मन्दिर (सकेतड़ी, पंचकूला) में 2 वर्ष तक चलाया गया, लेकिन उचित व्यवस्था नहीं प्राप्त हो सकी, क्योंकि गुरुकुल अपने शैशवावस्था में धनाभाव के कारण स्वयं विद्यार्थियों को उचित व्यवस्था देने में असमर्थ था और समाज पर ही आश्रित था। इसी बीच में आचार्य जी द्वारा 2004 से लेकर 2014 तक जयपुर (राजस्थान), अर्की जिला सोलन (हिमाचल प्रदेश) महाकाली मन्दिर सेक्टर-30 (चण्डीगढ़) बाबा बालकनाथ मन्दिर, ट्रिब्यून चौक (चण्डीगढ़) प्लाट नं. 81 औद्योगिक क्षेत्र फेस – 1 (पंचकूला ) प्राचीन शिव मन्दिर, मौली जागरा (चण्डीगढ़ ) ग्रीनसिटी (जीरकपुर ) लक्ष्मी भवन धर्मशाला (पंचकूला) आदि अनेक स्थानों पर गुरुकुल अस्थाई रूप में चलता रहा, लेकिन कहीं पर भी स्थाई व्यवस्था नहीं प्राप्त कर सका।
संस्कृत के संरक्षण में कटिबद्ध आचार्य जी विपरीत परिस्थितियों में भी गुरुकुल के लक्ष्य को पाने के लिए अथक परिश्रम करते रहे, संस्कृत गुरुकुल के विद्यार्थियों का परचम न केवल गुरुकुल अपितु संस्कृत महाविद्यालयों विश्वविद्यालयों में प्रतिस्पर्धा के माध्यम से लहराता रहा तथा संस्कृत परम्परा के जगत् में अपने स्वरूप को स्थापित करने का प्रयास करता रहा । गुरुकुल के सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्य को समाज में बहुत सम्मान प्राप्त हुआ और गुरुकुल का अपना भूमि-भवन हो इसके लिए आचार्य जी का प्रयास अनवरत चलता रहा । गुरुकुल के सहयोगी श्री ईश्वर जिन्दल जी ने आचार्य स्वामी प्रसाद मिश्र जी को आश्वासन दिया कि इस नेक कार्य हेतु मैं सरकार से भूमि हेतु याचना करूँगा, जिससे सनातन संस्कृति के प्रचार में आ रही बाधा दूर की जा सके। इसी क्रम में गुरुकुल के सदस्यों द्वारा 2013 में भगवान् श्रीराम कथा का तथा 2016 में श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज के मुखारविंद से करवाया गया। इस कार्यक्रम में श्रीमान् ईश्वर जिंदल जी के प्रयासों से हरियाणा के यशस्वी मुख्यमंत्री माननीय श्री मनोहर लाल खट्टर जी का कथा में आगमन हुआ।

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