श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल)
पंचकूला (हरियाणा)
वेदों का प्रकाश, संस्कृति का विकास - यही है हमारा प्रयास!
हमारा परिचय
श्री मुक्तिनाथ वेद विद्या आश्रम एक प्राचीन भारतीय गुरुकुल परंपरा पर आधारित आवासीय संस्कृत गुरुकुल है, जिसका उद्देश्य वेद, उपनिषद, संस्कृत, दर्शन, ज्योतिष, और आधुनिक विषयों के समन्वय से भावी पीढ़ी को संस्कारित, विद्वान और नेतृत्वक्षम बनाना है। यहाँ विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में रहकर निःशुल्क शिक्षा, आवास, भोजन और सम्पूर्ण वैदिक जीवनशैली का पालन करते हैं।
हमारी दृष्टि
हम एक ऐसा शिक्षण केंद्र बनाना चाहते हैं जहाँ प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा प्रणाली का सुंदर संगम हो, जो विद्यार्थियों को शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाए।
हमारी यात्रा
आचार्य श्री स्वामीप्रसाद मिश्र (श्रीनिवासाचार्य जी) द्वारा स्थापित यह गुरुकुल 2001 में चंडीगढ़ से प्रारंभ हुआ और अनेक कठिनाइयों के बावजूद आज पंचकूला में अपने स्थायी परिसर में संचालित है। हरियाणा सरकार, समाज और श्रद्धालुओं के सहयोग से यह आश्रम आज भारतीय संस्कृति के संरक्षण का एक जीवंत उदाहरण बन चुका है।
संस्थापक संदेश
गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति बालक के अज्ञान, प्रमाद एवं दुराग्रह को दूर कर उसकी सुप्त प्रतिभाओं का जागरण करते हुए उसके लिए ज्ञान-विज्ञान के द्वार खोलती है। गुरुकुलीय शिक्षा बालक में विनम्रता, सच्चरित्रता, साहस, स्वाभिमान, लक्ष्य के प्रति दृढ़ता, राष्ट्र के प्रति गौरव, कर्त्तव्य के प्रति सजगता, सहिष्णुता, करुणा, दया, प्रेम, सेवा व सद्भाव आदि मौलिक गुणों का विकास करती है।
संस्कृत हमारी सनातन संस्कृति की आत्मा है, और वेद इसका शाश्वत प्राण। आज जब भौतिकता की चकाचौंध में मूल्य एवं मर्यादाएँ धुंधली पड़ रही हैं, तब आवश्यक है कि हम अपने प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश में जीवन को फिर से अर्थवान बनाएं।
श्रीमुक्तिनाथ वेदविद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) का उद्देश्य केवल ग्रंथों का पठन-पाठन नहीं, अपितु ‘सा विद्या या विमुक्तये’ — उस ज्ञान का अभ्यास है जो आत्मा को बन्धनों से मुक्त कर सके, समाज में चेतना भर सके, और राष्ट्र को सांस्कृतिक बल दे सके।
यह गुरुकुल गुरु-शिष्य परंपरा की भावना को जीता है, जहाँ छात्रों को वेद, शास्त्र, व्याकरण, दर्शन एवं नीति का पारंपरिक पद्धति से शिक्षण दिया जाता है। साथ ही, जीवन में अनुशासन, सेवा, चरित्र और करुणा जैसे गुणों का भी समावेश किया जाता है। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु गुरुकुल का परिसर एक ऐसा परिसर बन गया है, जो समग्र जीवन और सहजीवन के सभी गुणसूत्रों का प्रशिक्षण अपने विद्यार्थियों को देता है। यहाँ के सुसज्जित कक्षा-कक्ष, सुविधायुक्त छात्रावास, खेल-कूद के विशाल मैदान, संगीत कक्ष, संगणक कक्ष, मन्दिर, यज्ञशाला अनेक प्रकल्प छात्रों में सुप्त पड़ी विभिन्न जिज्ञासाओं और प्रतिभाओं को स्वर और आकार देते हैं। यह परिसर अपनी सम्पूर्ण सामर्थ्य से अपने विद्यार्थियों को सफलता दिलाने के लिए पर्णतया संकल्पित है।
मैं आप सभी जिज्ञासु, अभिभावक, विद्वानगण एवं संस्कृत-प्रेमियों से आग्रह करता हूँ कि इस पावन यज्ञ में सहभागी बनें— ज्ञानदान से बढ़कर कोई दान नहीं, और संस्कृति-रक्षा से बढ़कर कोई सेवा नहीं। “विद्या परमैश्वर्यम्”
गुरुकुल जीवन


















हमारी विशेषताएँ
विद्यार्थी पूर्णतः आवासीय वातावरण में रहते हैं, जहाँ भोजन, वस्त्र, पुस्तकें और सभी मूलभूत सुविधाएँ निःशुल्क उपलब्ध हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा के अनुरूप विद्यार्थी विद्या, संस्कार और जीवनमूल्य गुरुदेव के सान्निध्य में सीखते हैं।
प्रत्येक दिन यज्ञ, आरती, योग और बौद्धिक चर्चा के माध्यम से विद्यार्थियों का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है।
जाति, वर्ग या सम्प्रदाय के भेद से परे, सभी विद्यार्थियों को एक समान प्रेम, सम्मान और अवसर दिया जाता है।
गुरुकुल में सभी भारतीय सांस्कृतिक पर्व और उत्सव धूमधाम से मनाए जाते हैं, जिससे विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना जागृत होती है।
विद्यार्थियों को वेद, उपनिषद, दर्शन, ज्योतिष और संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन कराया जाता है, जिससे वे विद्वत्ता और आध्यात्मिकता के शिखर तक पहुँच सकें।
1. विद्या – आधुनिक शिक्षा
शिक्षा का मतलब जीविकोपार्जन करना नहीं है, बल्कि एक अच्छे करियर के साथ दुनिया में योगदान देने के लिए पर्याप्त योग्यता प्राप्त करना है। शिक्षित व्यक्ति के वास्तविक मूल्यों को प्रदान करने के लिए पारंपरिक शिक्षा प्रणाली को फिर से परिभाषित किया जाना चाहिए। विद्या के मूल्य आधुनिक दुनिया के पेशेवर की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
महत्वाकांक्षा
उत्कृष्टता की खोज को प्रेरित करना, दृढ़ संकल्प को बढ़ावा देना, तथा पूर्ण क्षमता प्राप्त करना।
रचनात्मकता
नवीन सोच और समस्या समाधान कौशल का विकास, मौलिकता और आविष्कारशील समाधानों को प्रोत्साहित करना
नेतृत्व
जिम्मेदार, नैतिक नेताओं का विकास करना जो समाज में सकारात्मक योगदान देने के लिए तैयार हों
गतिशीलता
विद्यार्थियों को उत्साह और ऊर्जा के साथ सीखने के लिए सशक्त बनाना, एक सक्रिय शैक्षणिक और व्यक्तिगत विकास वातावरण को बढ़ावा देना
जिज्ञासा
अन्वेषण और खोज के लिए आजीवन जुनून को पोषित करना, छात्रों को प्रश्न पूछने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना
2. सद्विद्या – पारंपरिक शिक्षा
प्राचीन भारतीय संस्कृति से निकाले गए मूल्यों और नैतिकता के वास्तविक सार के साथ ज्ञान प्रदान करके शुरू से ही छात्रों के जीवन को बदलना, एक छात्र के जीवन को एक खुश और आनंदमय यात्रा में बदलना - सद्विद्या प्रदान करने से छात्र को विकसित होने में मदद मिलती है…
बुरी आदतों से मुक्ति
हानिकारक आदतों से मुक्त स्वस्थ, अनुशासित जीवन शैली को बढ़ावा देना, कल्याण और आत्म-नियंत्रण पर जोर देना
अखंडता
इरादे, दृष्टिकोण, व्यवहार और कार्य द्वारा विवेकपूर्ण होने का गुण। अच्छे स्रोत का विकास करता है
कृतज्ञता
आशीर्वाद के प्रति कृतज्ञता की भावना पैदा करना, सकारात्मक दृष्टिकोण और उदारता को बढ़ावा देना
अहिंसा
प्रत्येक जीव नैतिक ढांचे का हिस्सा है, कोई भी अपने लाभ के लिए उनके जीने के अधिकार को नहीं छीन सकता।
समानुभूति
समझदारी और करुणा को प्रोत्साहित करना, दयालुता और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना
3. ब्रह्मविद्या – आध्यात्मिक शिक्षा
आम तौर पर, आध्यात्मिकता को विश्वास का विषय माना जाता है। खैर, यह एक गलत धारणा है, आध्यात्मिकता वास्तव में सर्वशक्तिमान का अनुभव है। ब्रह्मविद्या मूल्य, शाश्वत वेदों और सर्वोच्च भगवान श्री स्वामीनारायण द्वारा परिभाषित अभ्यास, हमें स्वयं और सर्वशक्तिमान ईश्वर की प्राप्ति के इस अद्भुत ज्ञान की ओर ले जाते हैं।
आस्था
आध्यात्मिक शास्त्रों और ईश्वर में दृढ़ विश्वास और आस्था रखना, क्योंकि वे परम अस्तित्व और आत्माओं के लिए आश्रय हैं।
ईश्वर प्राप्ति
अपने अंदर और आस-पास दिव्य उपस्थिति के प्रति जागरूकता पैदा करना, छात्रों को आध्यात्मिक ज्ञान की ओर मार्गदर्शन करना
संतों के प्रति स्नेह
सच्चे संतों और भक्तों के साथ मजबूत भावनात्मक बंधन और बिना शर्त स्नेह रखना। छात्रों को अपने जीवन में सद्गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करना।
आत्म-साक्षात्कार
अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति जागृति, व्यक्तिगत खोज के माध्यम से आंतरिक शांति और पूर्णता को बढ़ावा देना।
भक्ति
ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम एवं स्नेह रखना, जैसे ईश्वर का नाम जपना, सेवा करना आदि।
अनासक्ति
भौतिकवादी वस्तुओं से विरक्ति का ज्ञान विकसित करना। छात्रों को आध्यात्मिक समृद्धि में आनंद और तृप्ति पाने के लिए प्रोत्साहित करना।
हमारी शिक्षा
श्री मुक्तिनाथ वेद विद्या आश्रम में शिक्षा केवल विषयों तक सीमित नहीं है, यह एक जीवन निर्माण प्रक्रिया है। हम विद्यार्थियों को वैदिक परंपरा और आधुनिक विज्ञान का अद्भुत संगम प्रदान करते हैं, जिससे वे ज्ञान, कौशल और संस्कार – तीनों क्षेत्रों में पूर्ण विकसित बन सकें।
आधुनिक शिक्षा के विषय
हम पारंपरिक ज्ञान के साथ-साथ विद्यार्थियों को इस बदलती दुनिया के अनुरूप आधुनिक विषयों में भी दक्ष बनाते हैं:
- हिंदी और अंग्रेजी भाषा: भाषायी दक्षता, लेखन-कला एवं संवाद-कौशल।
- गणित: वैदिक गणित तकनीक के साथ आधुनिक गणित की संपूर्ण समझ।
- विज्ञान: भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान की आधारभूत तथा व्यावहारिक शिक्षा।
- सामाजिक अध्ययन और राजनीति विज्ञान: समाज, संस्कृति और शासन व्यवस्था की समझ।
- संगणक (कंप्यूटर शिक्षा): कंप्यूटर साक्षरता, बेसिक प्रोग्रामिंग, इंटरनेट उपयोग और डिजिटल कौशल।
वैदिक एवं शास्त्रीय शिक्षा
हम विद्यार्थियों को प्राचीन भारतीय ज्ञान-सागर से सीधा जोड़ते हैं:
- वेद: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का गहन अध्ययन एवं वेदपाठ।
- व्याकरण: पाणिनि, पतंजलि और भट्टोजि दीक्षित द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का विश्लेषणात्मक अभ्यास।
- मीमांसा: धर्म, कर्मकाण्ड और वेदों के गूढ़ रहस्यों का अध्ययन।
- दर्शन: षड्दर्शन (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत) की सूक्ष्म व्याख्या।
- ज्योतिष: वैदिक ज्योतिष, गणितीय पद्धति, फलित ज्योतिष, पंचांग निर्माण एवं भविष्यवाणी कला।
- साहित्य: कालिदास, भास, भवभूति, बाणभट्ट आदि के महान संस्कृत साहित्यकारों के ग्रंथों का अध्ययन और काव्य कला का विकास।
रामायण, महाभारत, गीता और पुराणों का भावनात्मक व बौद्धिक स्तर पर अध्ययन।
योग, ध्यान एवं जीवन निर्माण
गुरुकुल जीवन का केंद्र है आत्मानुशासन और आंतरिक विकास। इसके लिए:
- योगाभ्यास: शरीर और मन की एकता के लिए दैनिक योग शिक्षा।
- ध्यान साधना: मानसिक एकाग्रता, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक विकास हेतु ध्यान तकनीकें।
- वैदिक कर्मकाण्ड: यज्ञ, पूजन, संस्कार विधि और दैनिक आध्यात्मिक कृत्यों का प्रशिक्षण।
- नैतिक शिक्षा और संस्कार: चरित्र निर्माण, सेवा भावना, विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा का संचार।
- व्यक्तित्व विकास: आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल और सामाजिक जिम्मेदारी के विकास हेतु विशेष सत्र।